अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्य: पप्रच्छ भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देव: स्वप्नान्पश्यति कस्यैतत्सुखं भवति कस्मिन्नु सर्वे सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति॥ १॥
अथ=तदनन्तर; ह एनम्=इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद मुनि) से; गार्ग्य:=गर्गगोत्रमें उत्पन्न; सौर्यायणी पप्रच्छ=सौर्यायणी ऋषिने पूछा; भगवन्=भगवन्!; एतस्मिन् पुरुषे=इस मनुष्य-शरीरमें; कानि स्वपन्ति=कौन-कौन सोते हैं; अस्मिन् कानि जाग्रति=इसमें कौन-कौन जागते रहते हैं; एष: कतर: देव:=यह कौन देवता; स्वप्नान् पश्यति=स्वप्नोंको देखता है; एतत् सुखम्=यह सुख; कस्य भवति=किसको होता है; सर्वे=(और) ये सब-के-सब; कस्मिन्=किसमें; नु=निश्चितरूपसे; सम्प्रतिष्ठिता:=सम्पूर्णतया स्थित; भवन्ति इति=रहते हैं, यह; (मेरा प्रश्न है)॥ १॥
व्याख्या—यहाँ गार्ग्य मुनिने महात्मा पिप्पलादसे पाँच बातें पूछी हैं— (१) गाढ़ निद्राके समय इस मनुष्य-शरीरमें रहनेवाले पूर्वोक्त देवताओंमेंसे कौन-कौन सोते हैं? (२) कौन-कौन जागते रहते हैं? (३) स्वप्न-अवस्थामें इनमेंसे कौन देवता स्वप्नकी घटनाओंको देखता रहता है? (४) निद्रा-अवस्थामें सुखका अनुभव किसको होता है? और (५) ये सब-के-सब देवता सर्वभावसे किसमें स्थित हैं? अर्थात् किसके आश्रित हैं? इस प्रकार इस प्रश्नमें गार्ग्य मुनिने जीवात्मा और परमात्माका पूरा-पूरा तत्त्व पूछ लिया॥ १॥