विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वै:
प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र।
तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य
स सर्वज्ञ: सर्वमेवाविवेशेति॥ ११॥
यत्र=जिसमें; प्राणा:=समस्त प्राण (और); भूतानि च=पाँचों भूत तथा; सर्वै: देवै: सह=सम्पूर्ण इन्द्रिय और अन्त:करणके सहित; विज्ञानात्मा=विज्ञानस्वरूप आत्मा; सम्प्रतिष्ठन्ति=आश्रय लेते हैं; सोम्य=हे प्रिय!; तत् अक्षरम्=उस अविनाशी परमात्माको; य: तु वेदयते=जो कोई जान लेता है; स: सर्वज्ञ:=वह सर्वज्ञ है; सर्वम् एव=(वह) सर्वस्वरूप परमेश्वरमें; आविवेश=प्रविष्ट हो जाता है; इति=इस प्रकार (इस प्रश्नका उत्तर समाप्त हुआ)॥ ११॥
व्याख्या—सबके परम कारण जिन परमेश्वरमें समस्त प्राण और पाँचों महाभूत तथा समस्त इन्द्रियाँ और अन्त:करणके सहित स्वयं विज्ञानस्वरूप जीवात्मा—ये सब आश्रय लेते हैं, उन परम अक्षर अविनाशी परमात्माको जो कोई जान लेता है, वह सर्वज्ञ है तथा सर्वरूप परमेश्वरमें प्रविष्ट हो जाता है। इस प्रकार यह चतुर्थ प्रश्न समाप्त हुआ॥ ११॥