तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजा: पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानै:॥ ९॥
ह तेज: वै=प्रसिद्ध तेज (गर्मी) ही; उदान:=उदान है; तस्मात् =इसीलिये; उपशान्ततेजा:=जिसके शरीरका तेज शान्त हो जाता है, वह (जीवात्मा); मनसि=मनमें; सम्पद्यमानै:=विलीन हुई; इन्द्रियै:=इन्द्रियोंके साथ; पुनर्भवम्=पुनर्जन्मको (प्राप्त होता है)॥ ९॥
व्याख्या—सूर्य और अग्निका जो बाहरी तेज अर्थात् उष्णत्व है, वही उदानका बाह्य स्वरूप है। वह शरीरके बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंको ठंडा नहीं होने देता और शरीरके भीतरकी ऊष्माको भी स्थिर रखता है। जिसके शरीरसे उदानवायु निकल जाता है, उसका शरीर गरम नहीं रहता; अत: शरीरकी गर्मी शान्त हो जाते ही उसमें रहनेवाला जीवात्मा मनमें विलीन हुई इन्द्रियोंको साथ लेकर उदानवायुके साथ-साथ दूसरे शरीरमें चला जाता है (गीता १५। ८)॥ ९॥
सम्बन्ध—अब आश्वलायनके चौथे प्रश्नमें आयी हुई एक शरीरसे निकलकर दूसरे शरीरमें या लोकोंमें प्रवेश करनेकी बातका पुन: स्पष्टीकरण किया जाता है—