अथैकयोर्ध्व उदान: पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम्॥ ७॥
अथ=तथा; एकया=जो एक नाडी और है, उसके द्वारा; उदान: ऊर्ध्व:= उदानवायु ऊपरकी ओर; [चरति]=विचरता है; [स:] पुण्येन=वह पुण्यकर्मोंके द्वारा; [मनुष्यम्]=मनुष्यको; पुण्यम् लोकम्=पुण्यलोकोंमें; नयति=ले जाता है; पापेन=पापकर्मोंके कारण (उसे); पापम् [नयति]=पापयोनियोंमें ले जाता है (तथा); उभाभ्याम् एव=पाप और पुण्य दोनों प्रकारके कर्मोंद्वारा (जीवको); मनुष्यलोकम्=मनुष्य-शरीरमें; [नयति]=ले जाता है॥ ७॥
व्याख्या—इन ऊपर बतलायी हुई बहत्तर करोड़ नाड़ियोंसे भिन्न एक नाडी और है जिसको ‘सुषुम्णा’ कहते हैं, जो हृदयसे निकलकर ऊपर मस्तकमें गयी है। उसके द्वारा उदानवायु शरीरमें ऊपरकी ओर विचरण करता है। (इस प्रकार आश्वलायनके तीसरे प्रश्नका समाधान करके अब महर्षि उसके चौथे प्रश्नका उत्तर संक्षेपमें देते हैं—) जो मनुष्य पुण्यशील होता है, जिसके शुभकर्मोंके भोग उदय हो जाते हैं, उसे यह उदानवायु ही अन्य सब प्राण और इन्द्रियोंके सहित वर्तमान शरीरसे निकालकर पुण्यलोकोंमें अर्थात् स्वर्गादि उच्च लोकोंमें ले जाता है। पापकर्मोंसे युक्त मनुष्यको शूकर-कूकर आदि पाप-योनियोंमें और रौरवादि नरकोंमें ले जाता है तथा जो पाप और पुण्य—दोनों प्रकारके कर्मोंका मिश्रित फल भोगनेके लिये अभिमुख हुए रहते हैं, उनको मनुष्य-शरीरमें ले जाता है*॥ ७॥
* एक शरीरसे निकलकर जब मुख्य प्राण उदानको साथ लेकर उसके द्वारा दूसरे शरीरमें जाता है, तब अपने अङ्गभूत समान आदि प्राणोंको तथा इन्द्रिय और मनको तो साथ ले ही जाता है, इन सबका स्वामी जीवात्मा भी उसीके साथ जाता है (गीता १५। ८) यह बात यहाँ कहनी थी; इसीलिये पूर्व मन्त्रमें जीवात्माका स्थान हृदय बतलाया गया है एवं इसका स्पष्टीकरण १० वें मन्त्रमें किया गया है।
सम्बन्ध—अब दो मन्त्रोंमें आश्वलायनके पाँचवें और छठे प्रश्नका उत्तर देते हुए जीवात्माके प्राण और इन्द्रियोंसहित एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेकी बात भी स्पष्ट करते हैं—