यथा सम्राडेवाधिकृतान्विनियुङ्क्ते एतान्ग्रामानेतान्ग्रामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान्पृथक्पृथगेव संनिधत्ते॥ ४॥
यथा=जिस प्रकार; सम्राट् एव=चक्रवर्ती महाराज स्वयं ही; एतान् ग्रामान् एतान् ग्रामान् अधितिष्ठस्व=इन गाँवोंमें तुम रहो, इन गाँवोंमें तुम रहो; इति=इस प्रकार; अधिकृतान्=अधिकारियोंको; विनियुङ्क्ते=अलग-अलग नियुक्त करता है; एवम् एव=उसी प्रकार; एष: प्राण:=यह मुख्य प्राण; इतरान्=दूसरे; प्राणान्= प्राणोंको; पृथक् पृथक् एव=पृथक्-पृथक् ही; संनिधत्ते=स्थापित करता है॥ ४॥
व्याख्या—यहाँ महर्षि उदाहरणद्वारा तीसरे प्रश्नका समाधान करते हुए कहते हैं—‘जिस प्रकार भूमण्डलका चक्रवर्ती सम्राट् भिन्न-भिन्न ग्राम, मण्डल और जनपद आदिमें पृथक्-पृथक् अधिकारियोंकी नियुक्ति करता है और उनका कार्य बाँट देता है, उसी प्रकार यह सर्वश्रेष्ठ प्राण भी अपने अङ्गस्वरूप अपान, व्यान आदि दूसरे प्राणोंको शरीरके पृथक्-पृथक् स्थानोंमें पृथक्-पृथक् कार्यके लिये नियुक्त कर देता है॥ ४॥
सम्बन्ध—अब मुख्य प्राण, अपान और समान—इन तीनोंका वासस्थान और कार्य बतलाया जाता है—