आत्मन एष प्राणो जायते यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे॥ ३॥
एष: प्राण:=यह प्राण; आत्मन:=परमात्मासे; जायते=उत्पन्न होता है; यथा=जिस प्रकार; एषा छाया=यह छाया; पुरुषे=पुरुषके होनेपर (ही होती है); [तथा]=उसी प्रकार; एतत् =यह (प्राण); एतस्मिन्=इस (परमात्मा) के ही; आततम्=आश्रित है (और); अस्मिन् शरीरे=इस शरीरमें; मनोकृतेन=मनके किये हुए (संकल्प) से; आयाति=आता है॥ ३॥
व्याख्या—यहाँ महर्षि पिप्पलादने क्रमसे आश्वलायन ऋषिके दो प्रश्नोंका उत्तर दिया है। पहले प्रश्नका उत्तर तो यह है कि जिसका प्रकरण चल रहा है, वह सर्वश्रेष्ठ प्राण परमात्मासे उत्पन्न हुआ है। (मु० उ० २। ३) वह परब्रह्म परमेश्वर ही इसका उपादानकारण है और वही इसकी रचना करनेवाला है; अत: इसकी स्थिति उस सर्वात्मा महेश्वरके अधीन—उसीके आश्रित है—ठीक उसी प्रकार जैसे किसी मनुष्यकी छाया उसके अधीन रहती है। दूसरे प्रश्नका उत्तर यह है कि मनद्वारा किये हुए संकल्पसे वह शरीरमें प्रवेश करता है। भाव यह है कि मरते समय प्राणीके मनमें उसके कर्मानुसार जैसा संकल्प होता है, उसे वैसा ही शरीर मिलता है, अत: प्राणोंका शरीरमें प्रवेश मनके संकल्पसे ही होता है॥ ३॥
सम्बन्ध—अब आश्वलायनके तीसरे प्रश्नका उत्तर विस्तारपूर्वक आरम्भ किया जाता है—