तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि॥ २॥
तस्मै स: ह उवाच=उससे उन प्रसिद्ध महर्षिने कहा; अतिप्रश्नान् पृच्छसि=तू बड़े कठिन प्रश्न पूछ रहा है (किंतु); ब्रह्मिष्ठ: असि इति=वेदोंको अच्छी तरह जाननेवाला है; तस्मात् =अत:; अहम्=मैं; ते=तेरे; ब्रवीमि=प्रश्नोंका उत्तर देता हूँ॥ २॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें महर्षि पिप्पलादने आश्वलायन मुनिके प्रश्नोंको कठिन बतलाकर उनकी बुद्धिमत्ता और तर्कशीलताकी प्रशंसा की है और साथ ही यह भाव भी दिखलाया है कि ‘तू जिस ढंगसे पूछ रहा है, उसे देखते हुए तो मुझे तेरे प्रश्नोंका उत्तर नहीं देना चाहिये। परंतु मैं जानता हूँ कि तू तर्कबुद्धिसे नहीं पूछ रहा है, तू श्रद्धालु है, वेदोंमें निष्णात है; अत: मैं तेरे प्रश्नोंका उत्तर दे रहा हूँ’॥ २॥