अथ हैनं कौसल्यश्चाश्वलायन: पप्रच्छ भगवन्कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति॥ १॥
अथ ह एनम्=उसके बाद इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद)-से; कौसल्य: आश्वलायन:=कोसलदेशीय आश्वलायनने; च=भी; पप्रच्छ=पूछा; भगवन्=भगवन्!; एष: प्राण:=यह प्राण; कुत: जायते=किससे उत्पन्न होता है; अस्मिन् शरीरे=इस शरीरमें; कथम् आयाति=कैसे आता है; वा आत्मानम्=तथा अपनेको; प्रविभज्य=विभाजित करके; कथम् प्रातिष्ठते=किस प्रकार स्थित होता है; केन उत्क्रमते=किस ढंगसे उत्क्रमण करता—शरीरसे बाहर निकलता है; कथम् बाह्यम्=किस प्रकार बाह्य जगत् को; अभिधत्ते=भलीभाँति धारण करता है (और); कथम् अध्यात्मम्=किस प्रकार मन और इन्द्रिय आदि शरीरके भीतर रहनेवाले जगत् को; इति=यही (मेरा प्रश्न है)॥ १॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें आश्वलायन मुनिने महर्षि पिप्पलादसे कुल छ: बातें पूछी हैं—(१)जिस प्राणकी महिमाका आपने वर्णन किया, वह प्राण किससे उत्पन्न होता है? (२) वह इस मनुष्य-शरीरमें कैसे प्रवेश करता है? (३) अपनेको विभाजित करके किस प्रकार शरीरमें स्थित रहता है? (४) एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाते समय पहले शरीरसे किस प्रकार निकलता है? (५) इस बाह्य (पाञ्चभौतिक) जगत्को किस प्रकार धारण करता है? तथा (६) मन और इन्द्रिय आदि आध्यात्मिक (आन्तरिक) जगत्को किस प्रकार धारण करता है? यहाँ प्राणके विषयमें वे ही बातें पूछी गयी हैं, जिनका वर्णन पहले उत्तरमें नहीं आया है और जो पहले प्रश्नके उत्तरको सुनकर ही स्फुरित हुई हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रश्नोत्तरके समय सुकेशादि छहों ऋषि वहाँ साथ-साथ बैठे सुन रहे थे॥ १॥