उत्पत्तिमायतिं स्थानं
विभुत्वं चैव पञ्चधा।
अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृत-
मश्नुते विज्ञायामृतमश्नुत इति॥ १२॥
प्राणस्य=प्राणकी; उत्पत्तिम्=उत्पत्ति; आयतिम्=आगम; स्थानम्=स्थान; विभुत्वम् एव=और व्यापकताको भी; च=तथा; [बाह्यम्] एव अध्यात्मम् पञ्चधा च=बाह्य एवं आध्यात्मिक पाँच भेदोंको भी; विज्ञाय=भलीभाँति जानकर; अमृतम् अश्नुते=(मनुष्य) अमृतका अनुभव करता है; विज्ञाय अमृतम् अश्नुते इति=जानकर अमृतका अनुभव करता है। यह पुनरुक्ति प्रश्नकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है॥ १२॥
व्याख्या—उपर्युक्त विवेचनके अनुसार जो मनुष्य प्राणकी उत्पत्तिको अर्थात् यह जिससे और जिस प्रकार उत्पन्न होता है—इस रहस्यको जानता है, शरीरमें उसके प्रवेश करनेकी प्रक्रियाका तथा इसकी व्यापकताका ज्ञान रखता है तथा जो प्राणकी स्थितिको अर्थात् बाहर और भीतर—कहाँ-कहाँ वह रहता है, इस रहस्यको तथा इसके बाहरी और भीतरी अर्थात् आधिभौतिक और आध्यात्मिक पाँचों भेदोंके रहस्यको भलीभाँति समझ लेता है, वह अमृतस्वरूप परमानन्दमय परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है तथा उस आनन्दमयके संयोग-सुखका निरन्तर अनुभव करता है॥ १२॥