य एवं विद्वान्प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष श्लोक:॥ ११॥
य: विद्वान्=जो कोई विद्वान्; एवम् प्राणम्=इस प्रकार प्राण (के रहस्य) को; वेद=जानता है; अस्य=उसकी; प्रजा=संतानपरम्परा; न ह हीयते=कदापि नष्ट नहीं होती; अमृत:=(वह) अमर; भवति=हो जाता है; तत् एष:=इस विषयका यह (अगला); श्लोक:=श्लोक (है)॥ ११॥
व्याख्या—जो कोई विद्वान् इस प्रकार इस प्राणके रहस्यको समझ लेता है, प्राणके महत्त्वको समझकर हर प्रकारसे उसे सुरक्षित रखता है, उसकी अवहेलना नहीं करता, उसकी संतानपरम्परा कभी नष्ट नहीं होती, क्योंकि उसका वीर्य अमोघ और अद्भुत शक्तिसम्पन्न हो जाता है। और वह यदि उसके आध्यात्मिक रहस्यको समझकर अपने जीवनको सार्थक बना लेता है, एक क्षण भी भगवान्के चिन्तनसे शून्य नहीं रहने देता, तो सदाके लिये अमर हो जाता है अर्थात् जन्म-मरणरूप संसारसे मुक्त हो जाता है। इस विषयपर निम्नलिखित ऋचा है—॥ ११॥