यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्त: सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति॥ १०॥
एष:=यह (जीवात्मा); यच्चित्त:=जिस संकल्पवाला होता है; तेन=उस संकल्पके साथ; प्राणम्=मुख्य प्राणमें; आयाति=स्थित हो जाता है; प्राण:=मुख्य प्राण; तेजसा युक्त:=तेज (उदान) से युक्त हो; आत्मना सह=अपने सहित (मन, इन्द्रियोंसे युक्त जीवात्माको); यथासंकल्पितम्= उसके संकल्पानुसार; लोकम्=भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनिमें; नयति=ले जाता है॥ १०॥
व्याख्या—मरते समय इस आत्माका जैसा संकल्प होता है, इसका मन अन्तिम क्षणमें जिस भावका चिन्तन करता है (गीता ८। ६), उस संकल्पके सहित मन, इन्द्रियोंको साथ लिये हुए यह मुख्य प्राणमें स्थित हो जाता है। वह मुख्य प्राण उदानवायुसे मिलकर अपने सहित मन और इन्द्रियोंसे युक्त जीवात्माको उस अन्तिम संकल्पके अनुसार यथायोग्य भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनिमें ले जाता है। अत: मनुष्यको उचित है कि अपने मनमें निरन्तर एक भगवान्का ही चिन्तन रखे, दूसरा संकल्प न आने दे, क्योंकि जीवन अल्प और अनित्य है, न जाने कब अचानक इस शरीरका अन्त हो जाय। यदि उस समय भगवान्का चिन्तन न होकर कोई दूसरा संकल्प आ गया तो सदाकी भाँति पुन: चौरासी लाख योनियोंमें भटकना पड़ेगा॥ १०॥
सम्बन्ध—अब प्राणविषयक ज्ञानका सांसारिक और पारलौकिक फल बतलाते हैं—