देवानामसि वह्नितम: पितॄणां प्रथमा स्वधा।
ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि॥ ८॥
(हे प्राण!) देवानाम्=(तू) देवताओंके लिये; वह्नितम:=उत्तम अग्नि; असि=है; पितॄणाम्=पितरोंके लिये; प्रथमा स्वधा=पहली स्वधा है; अथर्वाङ्गिरसाम्=अथर्वाङ्गिरस आदि; ऋषीणाम्=ऋषियोंके द्वारा; चरितम्= आचरित; सत्यम्=सत्य; असि=है॥ ८॥
व्याख्या—हे प्राण! तू ही देवताओंके लिये हवि पहुँचानेवाला उत्तम अग्नि है। पितरोंके लिये पहली स्वधा है। अथर्वाङ्गिरस आदि ऋषियोंके द्वारा आचरित (अनुभूत) सत्य भी तू ही है॥ ८॥