प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे। तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति य: प्राणै: प्रतितिष्ठसि॥ ७॥
प्राण=हे प्राण!; त्वम् एव=तू ही; प्रजापति:=प्रजापति है; [त्वम् एव]=तू ही; गर्भे चरसि=गर्भमें विचरता है; प्रतिजायसे=(और तू ही) माता-पिताके अनुरूप होकर जन्म लेता है; तु=निश्चय ही; इमा:=ये सब; प्रजा:=प्राणी; तुभ्यम्=तुझे; बलिम् हरन्ति=भेंट समर्पण करते हैं; य:=जो तू; प्राणै: प्रतितिष्ठसि=(अपानादि अन्य) प्राणोंके साथ-साथ स्थित हो रहा है॥ ७॥
व्याख्या—हे प्राण! तू ही प्रजापति (प्राणियोंका ईश्वर) है, तू ही गर्भमें विचरनेवाला और माता-पिताके अनुरूप संतानके रूपमें जन्म लेनेवाला है। ये सब जीव तुझे ही भेंट समर्पण करते हैं। भाव यह कि तुम्हारी तृप्तिके लिये ही अन्न भक्षण आदि कर रहे हैं। तू ही अपानादि सब प्राणोंके सहित सबके शरीरमें स्थित हो रहा है॥ ७॥