अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्।
ऋचो यजूॸषि सामानि यज्ञ: क्षत्रं ब्रह्म च॥ ६॥
रथनाभौ=रथके पहियेकी नाभिमें लगे हुए; अरा: इव=अरोंकी भाँति; ऋच:=ऋग्वेदकी सम्पूर्ण ऋचाएँ; यजूंषि=यजुर्वेदके मन्त्र (तथा); सामानि= सामवेदके मन्त्र; यज्ञ: च=यज्ञ और; ब्रह्म क्षत्रम्=(यज्ञ करनेवाले) ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अधिकारिवर्ग; सर्वम्=ये सब-के-सब; प्राणे=(इस) प्राणमें; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित हैं॥ ६॥
व्याख्या—जिस प्रकार रथके पहियेकी नाभिमें लगे हुए अरे नाभिके ही आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार ऋग्वेदकी सब ऋचाएँ, यजुर्वेदके समस्त मन्त्र, सब-का-सब सामवेद, उनके द्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञादि शुभकर्म और यज्ञादि शुभकर्म करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अधिकारिवर्ग—ये सब-के-सब प्राणके आधारपर ही टिके हुए हैं; सबका आश्रय प्राण ही है॥ ६॥
सम्बन्ध—इस प्रकार प्राणका महत्त्व बतलाकर अब उसकी स्तुति की जाती है—