एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायु:।
एष पृथिवी रयिर्देव: सदसच्चामृतं च यत्॥ ५॥
एष: अग्नि: तपति=यह प्राण अग्निरूपसे तपता है; एष: सूर्य:=यही सूर्य है; एष: पर्जन्य:=यही मेघ है; [एष:] मघवान्=यही इन्द्र है; एष: वायु:=यही वायु है (तथा); एष: देव:=यह प्राणरूप देव ही; पृथिवी=पृथ्वी (एवं); रयि:=रयि है (तथा); यत् =जो कुछ; सत् =सत् ; च=और; असत् =असत् है; च=तथा; [यत् ]=जो; अमृतम्=अमृत कहा जाता है (वह भी प्राण ही है)॥ ५॥
व्याख्या—वे वाणी आदि सब देवता स्तुति करते हुए बोले—यह प्राण ही अग्निरूप धारण करके तपता है और यही सूर्य है, यही मेघ, इन्द्र और वायु है। यही देव, पृथ्वी और रयि (भूतसमुदाय) है तथा सत् और असत् एवं उससे भी श्रेष्ठ जो अमृतस्वरूप परमात्मा है, वह भी यह प्राण ही है॥ ५॥