तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निराप: पृथिवी वाङ्मनश्चक्षु: श्रोत्रं च। ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयाम:॥ २॥
स: ह=उन प्रसिद्ध महर्षि (पिप्पलाद) ने; तस्मै उवाच=उन भार्गवसे कहा; ह आकाश: वै=निश्चय ही वह प्रसिद्ध आकाश; एष: देव:=यह देवता है (तथा); वायु:=वायु; अग्नि:=अग्नि; आप:=जल; पृथिवी=पृथिवी; वाक्=वाणी (कर्मेन्द्रियाँ); चक्षु: च श्रोत्रम् मन:=नेत्र और श्रोत्र (ज्ञानेन्द्रियाँ) तथा मन (अन्त:करण) भी [देवता है]; ते प्रकाश्य=वे सब अपनी-अपनी शक्ति प्रकट करते; अभिवदन्ति=अभिमानपूर्वक कहने लगे; वयम् एतत् बाणम्=हमने इस शरीरको; अवष्टभ्य=आश्रय देकर; विधारयाम:=धारण कर रखा है॥ २॥
व्याख्या—इस प्रकार भार्गवके पूछनेपर महर्षि पिप्पलाद उत्तर देते हैं। यहाँ दो प्रश्नोंका उत्तर एक ही साथ दे दिया गया है। वे कहते हैं कि सबका आधार तो वैसे आकाशरूप देवता ही है; परन्तु उससे उत्पन्न होनेवाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—ये चारों महाभूत भी शरीरको धारण किये रहते हैं। यह स्थूल शरीर इन्हींसे बना है। इसलिये ये धारक देवता हैं। वाणी आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ, नेत्र और कान आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन आदि चार अन्त:करण—ये चौदह देवता इस शरीरके प्रकाशक हैं। ये देवता देहको धारण और प्रकाशित करते हैं, इसलिये ये धारक और प्रकाशक देवता कहलाते हैं। ये इस देहको प्रकाशित करके आपसमें झगड़ पड़े और अभिमानपूर्वक परस्पर कहने लगे कि ‘हमने शरीरको आश्रय देकर धारण कर रखा है’॥ २॥