अथ हैनं भार्गवो वैदर्भि: पप्रच्छ। भगवन्कत्येव देवा: प्रजां विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते क: पुनरेषां वरिष्ठ इति॥ १॥
अथ ह एनम्=इसके पश्चात् इन प्रसिद्ध (महात्मा पिप्पलाद) ऋषिसे; वैदर्भि: भार्गव:=विदर्भदेशीय भार्गवने; पप्रच्छ=पूछा; भगवन्=भगवन्!; कति देवा: एव=कुल कितने देवता; प्रजां विधारयन्ते=प्रजाको धारण करते हैं; कतरे एतत् =उनमेंसे कौन-कौन इसे; प्रकाशयन्ते=प्रकाशित करते हैं; पुन:=फिर (यह भी बतलाइये कि); एषाम्=इन सबमें; क:=कौन; वरिष्ठ:=सर्वश्रेष्ठ है; इति=यही (मेरा प्रश्न है)॥ १॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें भार्गव ऋषिने महर्षि पिप्पलादसे तीन बातें पूछी हैं—(१) प्रजाको यानी प्राणियोंके शरीरको धारण करनेवाले कुल कितने देवता हैं? (२) उनमेंसे कौन-कौन इसको प्रकाशित करनेवाले हैं? (३) इन सबमें अत्यन्त श्रेष्ठ कौन है?॥ १॥