या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि।
या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमी:॥ १२॥
(हे प्राण!) या ते तनू:=जो तेरा स्वरूप; वाचि=वाणीमें; प्रतिष्ठिता=स्थित है; च=तथा; या श्रोत्रे=जो श्रोत्रमें; या चक्षुषि=जो चक्षुमें; च=और; या मनसि=जो मनमें; सन्तता=व्याप्त है; ताम्=उसको; शिवाम्=कल्याणमय; कुरु=बना ले; माउत्क्रमी:=(तू) उत्क्रमण न कर॥ १२॥
व्याख्या—हे प्राण! जो तेरा स्वरूप वाणी, श्रोत्र, चक्षु आदि समस्त इन्द्रियोंमें और मन आदि अन्त:करणकी वृत्तियोंमें व्याप्त है, उसे तू कल्याणमय बना ले। अर्थात् तुझमें जो हमें सावधान करनेके लिये आवेश आया है, उसे शान्त कर ले और तू शरीरसे उठकर बाहर न जा। यह हमलोगोंकी प्रार्थना है॥ १२॥