व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पति:।
वयमाद्यस्य दातार: पिता त्वं मातरिश्व न:॥ ११॥
प्राण=हे प्राण!; त्वम्=तू; व्रात्य:=संस्काररहित (होते हुए भी); एकर्षि:=एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है (तथा); वयम्=हमलोग (तेरे लिये); आद्यस्य=भोजनको; दातार:=देनेवाले हैं (और तू); अत्ता=भोक्ता (खानेवाला) है; विश्वस्य=समस्त जगत् का; सत्पति:=(तू ही) श्रेष्ठ स्वामी है; मातरिश्व=हे आकाशमें विचरनेवाले प्राण!; त्वम्=तू; न:=हमारा; पिता=पिता है॥ ११॥
व्याख्या—हे प्राण! तू संस्काररहित होकर भी एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है। तात्पर्य यह कि तू स्वभावसे ही शुद्ध है, अत: तुझे संस्कारद्वारा शुद्धिकी आवश्यकता नहीं है; प्रत्युत तू ही सबको पवित्र करनेवाला एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है। हमलोग (सब इन्द्रियाँ और मन आदि) तेरे लिये नाना प्रकारकी भोजन-सामग्री अर्पण करनेवाले हैं और तू उसे खानेवाला है। तू ही समस्त विश्वका उत्तम स्वामी है। हे आकाशचारी समष्टिवायुस्वरूप प्राण! तू हमारा पिता है; क्योंकि तुझीसे हम सबकी उत्पत्ति हुई है॥ ११॥