यदा त्वमभिवर्षस्यथेमा: प्राण ते प्रजा:।
आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति॥ १०॥
प्राण=हे प्राण!; यदा त्वम्=जब तू; अभिवर्षसि=भलीभाँति वर्षा करता है; अथ=उस समय; ते इमा: प्रजा:=तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा; कामाय=यथेष्ट; अन्नम्=अन्न; भविष्यति=उत्पन्न होगा; इति=यह समझकर; आनन्दरूपा:=आनन्दमय; तिष्ठन्ति=हो जाती है॥ १०॥
व्याख्या—हे प्राण! जब तू मेघरूप होकर पृथ्वीलोकमें सब ओर वर्षा करता है, तब तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा ‘हमलोगोंके जीवन-निर्वाहके लिये यथेष्ट अन्न उत्पन्न होगा’—ऐसी आशा करती हुई आनन्दमें मग्न हो जाती है॥ १०॥