संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते। त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऋषय: प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते। एष ह वै रयिर्य: पितृयाण:॥ ९॥
संवत्सर: वै=संवत्सर (बारह महीनोंवाला काल) ही; प्रजापति:=प्रजापति है; तस्य अयने=उसके दो अयन हैं—; दक्षिणम् च=एक दक्षिण और; उत्तरम् च=दूसरा उत्तर; तत् ये ह=वहाँ मनुष्योंमें जो लोग निश्चयपूर्वक; तत् इष्टापूर्ते वै=(केवल) उन इष्ट और पूर्त कर्मोंको ही; कृतम् इति=करनेयोग्य कर्म मानकर (सकाम भावसे); उपासते=उनकी उपासना करते हैं (उन्हींके अनुष्ठानमें लगे रहते हैं); ते चान्द्रमसम्=वे चन्द्रमाके; लोकम् एव=लोकको ही; अभिजयन्ते=जीतते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं (और); ते एव=वे ही; पुन: आवर्तन्ते=पुन: (वहाँसे) लौटकर आते हैं; तस्मात् एते=इसलिये ये; प्रजाकामा: ऋषय:=संतानकी कामनावाले ऋषिगण; दक्षिणम् प्रतिपद्यन्ते=दक्षिण (मार्ग)-को प्राप्त होते हैं; ह एष: वै रयि:=निस्संदेह यही वह रयि है; य: पितृयाण:=जो ‘पितृयान’ नामक मार्ग है॥ ९॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें संवत्सरको परमात्माका प्रतीक बनाकर उसके अङ्गरूप रयिस्थानीय भोग्य-पदार्थोंके उद्देश्यसे की जानेवाली उपासना और उसका फल बताते हैं। भाव यह है कि बारह महीनोंका यह संवत्सररूप काल ही मानो सृष्टिके स्वामी परमेश्वरका स्वरूप है। इसके दो अयन हैं— दक्षिण और उत्तर। दक्षिणायनके जो छ: महीने हैं, जिनमें सूर्य दक्षिणकी ओर घूमता है—ये मानो इसके दक्षिण अङ्ग हैं और उत्तरायणके छ: महीने ही उत्तर अङ्ग हैं। उनमें उत्तर अङ्ग तो प्राण है, इस विश्वके आत्मारूप उस परमेश्वरका सर्वान्तर्यामी स्वरूप है और दक्षिण अङ्ग रयि अर्थात् उसका बाह्यभोग्यस्वरूप है। इस जगत्में जो संतानकी कामनावाले ऋषि स्वर्गादि सांसारिक भोगोंमें आसक्त हैं, वे यज्ञादिद्वारा देवताओंका पूजन करना, ब्राह्मण एवं श्रेष्ठ पुरुषोंका धनादिसे सत्कार करना, दु:खी प्राणियोंकी सेवा करना आदि इष्टकर्म तथा कुँआ, बावली, तालाब, बगीचा, धर्मशाला, विद्यालय, औषधालय, पुस्तकालय आदि लोकोपकारी चिरस्थायी स्मारकोंकी स्थापना करना आदि पूर्तकर्मोंको उत्कृष्ट कर्तव्य समझते हैं और इनके फलस्वरूप इस लोक तथा परलोकके भोगोंके उद्देश्यसे इनकी उपासना अर्थात् विधिवत् अनुष्ठान करते हैं; यह उस संवत्सररूप परमेश्वरके दक्षिण अङ्गकी उपासना है। इसीको ईशावास्य-उपनिषद्में असम्भूतिकी उपासनाके नामसे देव, पितर, मनुष्य आदि शरीरोंकी सेवा बताया है। इसके प्रभावसे वे चन्द्रलोकको प्राप्त होते हैं और वहाँ अपने कर्मोंका फल भोगकर पुन: इस लोकमें लौट आते हैं; यही पितृयाण मार्ग है॥ ९॥