तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापति: स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते। रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजा: करिष्यत इति॥ ४॥
तस्मै स: ह उवाच=उससे वे प्रसिद्ध महर्षि बोले—; वै प्रजाकाम:=निश्चय ही प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छावाला (जो); प्रजापति:=प्रजापति है; स: तप: अतप्यत=उसने तप किया; स: तप: तप्त्वा=उसने तपस्या करके (जब सृष्टिका आरम्भ किया, उस समय पहले); स:=उसने; रयिम् च=एक तो रयि तथा; प्राणम् च=दूसरा प्राण भी; इति मिथुनम्=यह जोड़ा; उत्पादयते=उत्पन्न किया; एतौ मे=(इन्हें उत्पन्न करनेका उद्देश्य यह था कि) ये दोनों मेरी; बहुधा=नाना प्रकारकी; प्रजा:=प्रजाओंको; करिष्यत: इति=उत्पन्न करेंगे॥ ४॥
व्याख्या—कबन्धी ऋषिका यह प्रश्न सुनकर महर्षि पिप्पलाद बोले—हे कात्यायन! यह बात वेदोंमें प्रसिद्ध है कि सम्पूर्ण जीवोंके स्वामी परमेश्वरको सृष्टिके आदिमें जब प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने संकल्परूप तप किया। तपसे उन्होंने सर्वप्रथम रयि और प्राण—इन दोनोंका एक जोड़ा उत्पन्न किया। उसे उत्पन्न करनेका उद्देश्य यह था कि ये दोनों मिलकर मेरे लिये नाना प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न करेंगे। इस मन्त्रमें सबको जीवन प्रदान करनेवाली जो समष्टि जीवनी शक्ति है, उसे ही ‘प्राण’ नाम दिया गया है। इस जीवनी शक्तिसे ही प्रकृतिके स्थूल स्वरूपमें—समस्त पदार्थोंमें जीवन, स्थिति और यथायोग्य सामञ्जस्य आता है एवं स्थूल भूत-समुदायका नाम ‘रयि’ रखा गया है, जो प्राणरूप जीवनी शक्तिसे अनुप्राणित होकर कार्यक्षम होता है। प्राण चेतना है, रयि शक्ति और आकृति है। प्राण और रयिके संयोगसे ही सृष्टिका समस्त कार्य सम्पन्न होता है। इन्हींको अन्यत्र अग्नि और सोमके नामसे भी कहा गया है॥ ४॥