तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति॥ १६॥
येषु न=जिनमें न तो; जिह्मम्=कुटिलता (और); अनृतम्=झूठ है; च न=तथा न; माया=माया (कपट) ही है; तेषाम्=उन्हींको; असौ=वह; विरज:=विकाररहित, विशुद्ध; ब्रह्मलोक: इति=ब्रह्मलोक (मिलता है)॥ १६॥
व्याख्या—जिनमें कुटिलताका लेश भी नहीं है, जो स्वप्नमें भी मिथ्याभाषण नहीं करते और असत्यमय आचरणसे सदा दूर रहते हैं, जिनमें राग-द्वेषादि विकारोंका सर्वथा अभाव है, जो सब प्रकारके छल-कपटसे शून्य हैं, उन्हींको वह विकाररहित विशुद्ध ब्रह्मलोक मिलता है। जो इनसे विपरीत लक्षणोंवाले हैं, उनको नहीं मिलता॥ १६॥