तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते। तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम्॥ १५॥
तत् ये ह वै=जो कोई भी निश्चयपूर्वक; तत् प्रजापतिव्रतम्=उस प्रजापति-व्रतका; चरन्ति=अनुष्ठान करते हैं; ते मिथुनम्=वे जोड़ेको; उत्पादयन्ते=उत्पन्न करते हैं; येषाम् तप:=जिनमें तप (और); ब्रह्मचर्यम्=ब्रह्मचर्य (है); येषु सत्यम्=जिनमें सत्य; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; तेषाम् एव=उन्हींको; एष: ब्रह्मलोक:=यह ब्रह्मलोक मिलता है॥ १५॥
व्याख्या—जो लोग संतानोत्पत्तिरूप प्रजापतिके व्रतका अनुष्ठान करते हैं अर्थात् स्वर्गादि लोकोंके भोगकी प्राप्तिके लिये शास्त्रविहित शुभकर्मोंका आचरण करते हुए नियमानुसार स्त्री-प्रसङ्ग आदि भोगोंका उपभोग करते हैं, वे तो पुत्र और कन्यारूप जोड़ेको उत्पन्न करके प्रजाकी वृद्धि करते हैं और जो उनसे भिन्न हैं, जिनमें ब्रह्मचर्य और तप भरा हुआ है, जिनका जीवन सत्यमय है तथा जो सत्यस्वरूप परमेश्वरको अपने हृदयमें नित्य स्थित देखते हैं, उन्हींको वह ब्रह्मलोक (परमपद, परमगति) मिलता है, दूसरोंको नहीं॥ १५॥