अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमा: प्रजा: प्रजायन्त इति॥ १४॥
अन्नम् वै=अन्न ही; प्रजापति:=प्रजापति है; ह तत: वै=क्योंकि उसीसे; तत् रेत:=वह वीर्य (उत्पन्न होता है); तस्मात्=उस वीर्यसे; इमा: प्रजा:=ये सम्पूर्ण चराचर प्राणी; प्रजायन्ते इति=उत्पन्न होते हैं॥ १४॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें अन्नको प्रजापतिका स्वरूप बताकर अन्नकी महिमा बतलाते हुए कहते हैं कि यह सब प्राणियोंका आहाररूप अन्न ही प्रजापति है; क्योंकि इसीसे वीर्य उत्पन्न होता है और वीर्यसे समस्त चराचर प्राणी उत्पन्न होते हैं। इस कारण इस अन्नको भी प्रकारान्तरसे प्रजापति माना गया है॥ १४॥
सम्बन्ध—अब पहले बतलाये हुए दो प्रकारके साधकोंको मिलनेवाले पृथक्-पृथक् फलका वर्णन करते हैं—