अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयि: प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते॥ १३॥
अहोरात्र: वै=दिन और रातका जोड़ा ही; प्रजापति:=प्रजापति है; तस्य=उसका; अह: एव=दिन ही; प्राण:=प्राण है (और); रात्रि: एव=रात्रि ही; रयि:=रयि है; ये दिवा=(अत:) जो दिनमें; रत्या संयुज्यन्ते=स्त्री-सहवास करते हैं; एते=ये लोग; वै प्राणम्=सचमुच अपने प्राणोंको ही; प्रस्कन्दन्ति=क्षीण करते हैं (तथा); यत् रात्रौ=जो रात्रिमें; रत्या संयुज्यन्ते=स्त्री-सहवास करता है; तत् ब्रह्मचर्यम् एव=वह ब्रह्मचर्य ही है॥ १३॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें दिन और रात्रिरूप चौबीस घंटेके कालरूपमें परमेश्वरके स्वरूपकी कल्पना करके जीवनोपयोगी कर्मोंका रहस्य समझाया गया है। भाव यह है कि ये दिन और रात मिलकर जगत्पति परमेश्वरका पूर्णरूप हैं। उसका यह दिन तो मानो प्राण अर्थात् सबको जीवन देनेवाला प्रकाशमय विशुद्ध स्वरूप है और रात्रि ही भोगरूप रयि है। अत: जो मनुष्य दिनमें स्त्री-प्रसंग करते हैं अर्थात् परमात्माके विशुद्ध स्वरूपको प्राप्त करनेकी इच्छासे प्रकाशमय मार्गमें चलना प्रारम्भ करके भी स्त्री-प्रसंग आदि विलासमें आसक्त हो जाते हैं, वे अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर इस अमूल्य जीवनको व्यर्थ खो देते हैं। उनसे भिन्न जो सांसारिक उन्नति चाहनेवाले हैं, वे यदि शास्त्रके नियमानुसार ऋतुकालमें रात्रिके समय नियमानुकूल स्त्री-प्रसङ्ग करते हैं तो वे शास्त्रकी आज्ञाका पालन करनेके कारण ब्रह्मचारीके तुल्य ही हैं। लौकिक दृष्टिसे यों कह सकते हैं कि इस मन्त्रमें गृहस्थोंको दिनमें स्त्री-प्रसंग कदापि न करनेका और विहित रात्रियोंमें शास्त्रानुसार नियमित और संयमित-रूपमें केवल संतानकी इच्छासे स्त्री-सहवास करनेका उपदेश दिया गया है। तभी वह ब्रह्मचर्यकी गणनामें आ सकता है*॥ १३॥
* रजोदर्शनके दिनसे लेकर सोलह दिनोंतक स्वाभाविक ऋतुकाल कहलाता है। इनमें पहली चार रात्रियाँ तथा ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रियाँ सर्वथा वर्जित हैं। शेष दस रात्रियोंमें पर्व (एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, ग्रहण, व्यतिपात, संक्रान्ति, जन्माष्टमी, शिवरात्रि, रामनवमी आदि) दिनोंको छोड़कर पत्नीकी रतिकामनासे जो पुरुष महीनेमें केवल दो रात्रि स्त्री-सहवास करता है, वह गृहस्थाश्रममें रहता हुआ ही ब्रह्मचारी माना जाता है (मनुस्मृति ३। ४५—४७, ५०)