मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयि: शुक्ल: प्राणस्तस्मादेत ऋषय: शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन्॥ १२॥
मास: वै=महीना ही; प्रजापति:=प्रजापति है; तस्य=उसका; कृष्णपक्ष: एव=कृष्णपक्ष ही; रयि:=रयि है (और); शुक्ल: प्राण:=शुक्लपक्ष प्राण है; तस्मात् =इसलिये; एते ऋषय:=ये (कल्याणकामी) ऋषिगण; शुक्ले=शुक्लपक्षमें (निष्कामभावसे); इष्टम्=यज्ञादि कर्तव्य-कर्म; कुर्वन्ति=किया करते हैं (तथा); इतरे=दूसरे (जो सांसारिक भोगोंको चाहते हैं); इतरस्मिन्=दूसरे पक्षमें—कृष्णपक्षमें (सकामभावसे यज्ञादि शुभकर्मोंका अनुष्ठान किया करते हैं)॥ १२॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें महीनेको प्रजापति परमेश्वरका रूप देकर कर्मोंद्वारा उसकी उपासना करनेका रहस्य बताया गया है। भाव यह है कि प्रत्येक महीना ही मानो प्रजापति है, उसमें कृष्णपक्षके पंद्रह दिन तो उस परमात्माका दाहिना अङ्ग हैं; इसे रयि (स्थूल भूत-समुदायका कारण) समझना चाहिये। यह उस परमेश्वरका शक्तिस्वरूप भोगमय रूप है और शुक्लपक्षके पंद्रह दिन ही मानो उत्तर अङ्ग हैं। यही प्राण अर्थात् सबको जीवन प्रदान करनेवाले परमात्माका सर्वान्तर्यामी रूप है। इसलिये जो कल्याणकामी ऋषि हैं, अर्थात् जो रयिस्थानीय भोग-पदार्थोंसे विरक्त होकर प्राणस्थानीय सर्वात्मरूप परब्रह्मको चाहनेवाले हैं, वे अपने समस्त शुभकर्मोंको शुक्लपक्षमें करते हैं, अर्थात् शुक्लपक्षस्थानीय प्राणाधार परब्रह्म परमेश्वरके अर्पण करके कहते हैं—स्वयं उसका कोई फल नहीं चाहते; यही गीतोक्त कर्मयोग है। इनसे भिन्न जो भोगासक्त मनुष्य हैं, वे कृष्णपक्षमें अर्थात् कृष्णपक्षस्थानीय स्थूल पदार्थोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे सब प्रकारके कर्म किया करते हैं। इनका वर्णन गीतामें ‘स्वर्गपरा:’ के नामसे हुआ है (गीता २। ४२—४४)॥ १२॥