अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते। एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोक:॥ १०॥
अथ=किंतु (जो); तपसा=तपस्याके साथ; ब्रह्मचर्येण=ब्रह्मचर्यपूर्वक (और); श्रद्धया=श्रद्धासे युक्त होकर; विद्यया=अध्यात्मविद्याके द्वारा, आत्मानम्=परमात्माकी; अन्विष्य=खोज करके (जीवन सार्थक करते हैं, वे); उत्तरेण=उत्तरायण-मार्गसे; आदित्यम्=सूर्यलोकको; अभिजयन्ते=जीत लेते हैं (प्राप्त करते हैं); एतत् वै=यह (सूर्य) ही; प्राणानाम्=प्राणोंका; आयतनम्=केन्द्र है; एतत् अमृतम्=यह अमृत (अविनाशी) (और); अभयम्=निर्भय पद है; एतत् परायणम्=यह परमगति है; एतस्मात् =इससे; न पुन: आवर्तन्ते=पुन: लौटकर नहीं आते; इति एष:=इस प्रकार यह; निरोध:=निरोध (पुनरावृत्तिका निवारक) है; तत् एष:=(इस बातको स्पष्ट करनेवाला) यह (अगला); श्लोक:=श्लोक है॥ १०॥
व्याख्या—उपर्युक्त सकाम उपासकोंसे भिन्न जो कल्याणकामी साधक हैं, वे इन सांसारिक भोगोंकी अनित्यता और दु:खरूपताको समझकर इनसे सर्वथा विरक्त हो जाते हैं। वे श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए संयमके साथ त्यागमय जीवन बिताते हैं और अध्यात्मविद्याके द्वारा अर्थात् परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले किसी भी अनुकूल साधनद्वारा सबके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरकी निष्काम उपासना करते हैं। यह मानो उस संवत्सररूप प्रजापतिके उत्तर अङ्गकी उपासना है। इसको ईशावास्य-उपनिषद्में सम्भूतिकी उपासना कहा है। इसके उपासक उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकमें जाकर सूर्यके आत्मारूप परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त हो जाते हैं। यह सूर्य ही समस्त जगत्के प्राणोंका केन्द्र है। यही अमृत—अविनाशी और निर्भय पद है। यही परम गति है। इसे प्राप्त हुए महापुरुष फिर लौटकर नहीं आते। यह निरोध अर्थात् पुनर्जन्मको रोकनेवाला आत्यन्तिक प्रलय है। इस मन्त्रमें सूर्यको परमेश्वरका स्वरूप मानकर ही उपर्युक्त महिमा कही गयी है। इसी बातको अगले मन्त्रमें स्पष्ट किया गया है॥ १०॥