स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति। तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति॥ ९॥
ह=निश्चय ही; य: वै=जो कोई भी; तत् =उस; परमम् ब्रह्म=परमब्रह्म परमात्माको; वेद=जान लेता है; स:=वह महात्मा; ब्रह्म एव=ब्रह्म ही; भवति=हो जाता है; अस्य=इसके; कुले=कुलमें; अब्रह्मवित् =ब्रह्मको न जाननेवाला; न भवति=नहीं होता; शोकम् तरति=(वह) शोकसे पार हो जाता है; पाप्मानम् तरति=पापसमुदायसे तर जाता है; गुहाग्रन्थिभ्य:=हृदयकी गाँठोंसे; विमुक्त:=सर्वथा छूटकर; अमृत:=अमर; भवति=हो जाता है॥ ९॥
व्याख्या—यह बिलकुल सच्ची बात है कि जो कोई भी उस परब्रह्म परमात्माको जान लेता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है। उसके कुलमें अर्थात् उसकी संतानोंमें कोई भी मनुष्य ब्रह्मको न जाननेवाला नहीं होता। वह सब प्रकारके शोक और चिन्ताओंसे सर्वथा पार हो जाता है, सम्पूर्ण पापसमुदायसे सर्वथा तर जाता है, हृदयमें स्थित सब प्रकारके संशय, विपर्यय, देहाभिमान, विषयासक्ति आदि ग्रन्थियोंसे सर्वथा छूटकर अमर हो जाता है। जन्म-मृत्युसे रहित हो जाता है॥ ९॥
सम्बन्ध—इस ब्रह्मविद्याके अधिकारीका वर्णन करते हैं—