गता: कला: पञ्चदश प्रतिष्ठा
देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु।
कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा
परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति॥ ७॥
पञ्चदश=पंद्रह; कला:=कलाएँ; च=और; सर्वे=सम्पूर्ण; देवा:=देवता अर्थात् इन्द्रियाँ; प्रतिदेवतासु=अपने-अपने अभिमानी देवताओंमें; गता:=जाकर; प्रतिष्ठा:=स्थित हो जाते हैं; कर्माणि=(फिर) समस्त कर्म; च=और; विज्ञानमय:=विज्ञानमय; आत्मा=जीवात्मा; सर्वे=ये सब-के-सब; परे अव्यये=परम अविनाशी परब्रह्ममें; एकीभवन्ति=एक हो जाते हैं॥ ७॥
व्याख्या—उस महापुरुषका जब देहपात होता है, उस समय पंद्रह कलाएँ* और मनसहित सब इन्द्रियोंके देवता—ये सब अपने-अपने अभिमानी समष्टि देवताओंमें जाकर स्थित हो जाते हैं। उनके साथ उस जीवन्मुक्तका कोई सम्बन्ध नहीं रहता। उसके बाद उसके समस्त कर्म और विज्ञानमय जीवात्मा—सब-के-सब परम अविनाशी परब्रह्ममें लीन हो जाते हैं॥ ७॥
* पंद्रह कलाएँ ये हैं—श्रद्धा, आकाशादि पञ्च महाभूत, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक तथा नाम। (देखिये प्रश्नोपनिषद् ६। ४)
सम्बन्ध—किस प्रकार लीन हो जाते हैं? इस जिज्ञासापर कहते हैं—