वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्था:
संन्यासयोगाद् यतय: शुद्धसत्त्वा:।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले
परामृता: परिमुच्यन्ति सर्वे॥ ६॥
[ये] वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्था:=जिन्होंने वेदान्त (उपनिषद्) शास्त्रके विज्ञानद्वारा उसके अर्थभूत परमात्माको पूर्ण निश्चयपूर्वक जान लिया है (तथा); संन्यासयोगात् =कर्मफल और आसक्तिके त्यागरूप योगसे; शुद्धसत्त्वा:=जिनका अन्त:करण शुद्ध हो गया है; ते=वे; सर्वे=समस्त; यतय:=प्रयत्नशील साधकगण; परान्तकाले=मरणकालमें (शरीर त्यागकर); ब्रह्मलोकेषु=ब्रह्मलोकमें (जाते हैं और वहाँ); परामृता:=परम अमृतस्वरूप होकर; परिमुच्यन्ति=सर्वथा मुक्त हो जाते हैं॥ ६॥
व्याख्या—जिन्होंने वेदान्तशास्त्रके सम्यक् ज्ञानद्वारा उसके अर्थस्वरूप परमात्माको भलीभाँति निश्चयपूर्वक जान लिया है तथा कर्मफल और कर्मासक्तिके त्यागरूप योगसे जिनका अन्त:करण सर्वथा शुद्ध हो गया है, ऐसे सभी प्रयत्नशील साधक मरणकालमें शरीरका त्याग करके परब्रह्म परमात्माके परम धाममें जाते हैं और वहाँ परम अमृतस्वरूप होकर संसारबन्धनसे सदाके लिये सर्वथा मुक्त हो जाते हैं॥ ६॥
सम्बन्ध—जिनको परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति इसी शरीरमें हो जाती है, उनकी अन्तकालमें कैसी स्थिति होती है—इस जिज्ञासापर कहते हैं—