सम्प्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ता:
कृतात्मानो वीतरागा: प्रशान्ता:।
ते सर्वगं सर्वत: प्राप्य धीरा
युक्तात्मान: सर्वमेवाविशन्ति॥ ५॥
वीतरागा:=सर्वथा आसक्तिरहित; कृतात्मान:=(और) विशुद्ध अन्त:करणवाले; ऋषय:=ऋषिलोग; एनम्=इस परमात्माको; सम्प्राप्य=पूर्णतया प्राप्त होकर; ज्ञानतृप्ता:=ज्ञानसे तृप्त (एवं); प्रशान्ता:=परम शान्त (हो जाते हैं); युक्तात्मान:=अपने-आपको परमात्मामें संयुक्त कर देनेवाले; ते=वे; धीरा:=ज्ञानीजन; सर्वगम्=सर्वव्यापी परमात्माको; सर्वत:=सब ओरसे; प्राप्य=प्राप्त करके; सर्वम् एव=सर्वरूप परमात्मामें ही; आविशन्ति=प्रविष्ट हो जाते हैं॥ ५॥
व्याख्या—वे विशुद्ध अन्त:करणवाले सर्वथा आसक्तिरहित महर्षिगण उपर्युक्त प्रकारसे इन परब्रह्म परमात्माको भलीभाँति प्राप्त होकर ज्ञानसे तृप्त हो जाते हैं। उन्हें किसी प्रकारके अभावका बोध नहीं होता, वे पूर्णकाम—परम शान्त हो जाते हैं। वे अपने-आपको परमात्मामें लगा देनेवाले ज्ञानीजन सर्वव्यापी परमात्माको सब ओरसे प्राप्त करके सर्वरूप परमात्मामें ही पूर्णतया प्रविष्ट हो जाते हैं॥ ५॥
सम्बन्ध—इस प्रकार परमात्माको प्राप्त हुए महापुरुषोंकी महिमाका वर्णन करके अब ब्रह्मलोकमें जानेवाले महापुरुषोंकी मुक्तिका वर्णन करते हैं—