नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो
न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात्।
एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वां-
स्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम॥ ४॥
अयम्=यह; आत्मा=परमात्मा; बलहीनेन=बलहीन मनुष्यद्वारा; न लभ्य:=नहीं प्राप्त किया जा सकता; च=तथा; प्रमादात् =प्रमादसे; वा=अथवा; अलिङ्गात् =लक्षणरहित; तपस:=तपसे; अपि=भी; न [लभ्य:]=नहीं प्राप्त किया जा सकता; तु=किंतु; य:=जो; विद्वान्=बुद्धिमान् साधक; एतै:=इन; उपायै:=उपायोंके द्वारा; यतते=प्रयत्न करता है; तस्य=उसका; एष:=यह; आत्मा=आत्मा; ब्रह्मधाम=ब्रह्मधाममें; विशते=प्रविष्ट हो जाता है॥ ४॥
व्याख्या—इस प्रकरणमें बताये हुए सबके आत्मारूप परब्रह्म परमेश्वर उपासनारूप बलसे रहित मनुष्यद्वारा नहीं प्राप्त किये जा सकते। समस्त भोगोंकी आशा छोड़कर एकमात्र परमात्माकी ही उत्कट अभिलाषा रखते हुए निरन्तर विशुद्धभावसे अपने इष्टदेवका चिन्तन करना—यही उपासनारूपी बलका संचय करना है। ऐसे बलसे रहित पुरुषको वे नहीं मिलते। इसी प्रकार कर्तव्यत्यागरूप प्रमादसे भी नहीं मिलते तथा सात्त्विक लक्षणोंसे रहित संयमरूप तपसे भी किसी साधकद्वारा नहीं प्राप्त किये जा सकते। किंतु जो बुद्धिमान् साधक इन पूर्वोक्त उपायोंसे प्रयत्न करता है, अर्थात् प्रमादरहित होकर उत्कट अभिलाषाके साथ निरन्तर उन परमेश्वरकी उपासना करता है, उसका आत्मा परब्रह्म परमात्माके स्वरूपमें प्रविष्ट हो जाता है॥ ४॥
सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे परमात्माको प्राप्त हुए महापुरुषोंके महत्त्वका वर्णन करते हैं—