नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्य-
स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम्॥ ३॥ *
* यह मन्त्र कठोपनिषद्में भी इसी प्रकार है (१। २। २३)।
अयम्=यह; आत्मा=परब्रह्म परमात्मा; न प्रवचनेन=न तो प्रवचनसे; न मेधया=न बुद्धिसे (और); न बहुना श्रुतेन=न बहुत सुननेसे ही; लभ्य:=प्राप्त हो सकता है; एष:=यह; यम्=जिसको; वृणुते=स्वीकार कर लेता है; तेन एव=उसके द्वारा ही; लभ्य:=प्राप्त किया जा सकता है (क्योंकि); एष:=यह; आत्मा=परमात्मा; तस्य=उसके लिये; स्वाम् तनुम्=अपने यथार्थ स्वरूपको; विवृणुते=प्रकट कर देता है॥ ३॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें यह बात समझायी गयी है कि वे परमात्मा न तो उनको मिलते हैं, जो शास्त्रोंको पढ़-सुनकर लच्छेदार भाषामें परमात्म-तत्त्वका नाना प्रकारसे वर्णन करते हैं, न उन तर्कशील बुद्धिमान् मनुष्योंको ही मिलते हैं जो बुद्धिके अभिमानमें प्रमत्त हुए तर्कके द्वारा विवेचन करके उन्हें समझनेकी चेष्टा करते हैं और न उन्हींको मिलते हैं, जो परमात्माके विषयमें बहुत कुछ सुनते रहते हैं। वे तो उसीको प्राप्त होते हैं, जिसको वे स्वयं स्वीकार कर लेते हैं और वे स्वीकार उसीको करते हैं, जिसको उनके लिये उत्कट इच्छा होती है, जो उनके बिना रह नहीं सकता। जो अपनी बुद्धि या साधनपर भरोसा न करके केवल उनकी कृपाकी ही प्रतीक्षा करता रहता है, ऐसे कृपा-निर्भर साधकपर परमात्मा कृपा करते हैं और योगमायाका परदा हटाकर उसके सामने अपना स्वरूप प्रकट कर देते हैं॥ ३॥