कामान् य: कामयते मन्यमान:
स कामभिर्जायते तत्र तत्र।
पर्याप्तकामस्य कृतात्मन-
स्त्विहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामा:॥ २॥
य:=जो; कामान्=भोगोंको; मन्यमान:=आदर देनेवाला मानव; कामयते=(उनकी) कामना करता है; स:=वह; कामभि:=उन कामनाओंके कारण; तत्र तत्र=उन-उन स्थानोंमें; जायते=उत्पन्न होता है (जहाँ वे उपलब्ध हो सकें); तु=परंतु; पर्याप्तकामस्य=जो पूर्णकाम हो चुका है, उस; कृतात्मन:=विशुद्ध अन्त:करणवाले पुरुषकी; सर्वे=सम्पूर्ण; कामा:=कामनाएँ; इह एव=यहीं; प्रविलीयन्ति=सर्वथा विलीन हो जाती हैं॥ २॥
व्याख्या—जो भोगोंको आदर देनेवाला है, जिसकी दृष्टिमें इस लोक और परलोकके भोग सुखके हेतु हैं, वही भोगोंकी कामना करता है और नाना प्रकारकी कामनाओंके कारण ही जहाँ-जहाँ भोग उपलब्ध हो सकते हैं, वहाँ-वहाँ कर्मानुसार उत्पन्न होता है; परंतु जो भगवान्को चाहनेवाले भगवान्के प्रेमी भक्त पूर्णकाम हो गये हैं, इस जगत्के भोगोंसे ऊब गये हैं, उन विशुद्ध अन्त:करणवाले भक्तोंकी समस्त कामनाएँ इस शरीरमें ही विलीन हो जाती हैं। स्वप्नमें भी उनकी दृष्टि भोगोंकी ओर नहीं जाती। फलत: उन्हें शरीर छोड़नेपर नवीन जन्म नहीं धारण करना पड़ता। वे भगवान्को पाकर जन्म-मृत्युके बन्धनसे सदाके लिये छूट जाते हैं॥ २॥
सम्बन्ध—पहले दो मन्त्रोंमें भगवान्के परम दुलारे जिन प्रेमी भक्तोंका वर्णन किया गया है, उन्हींको वे सर्वात्मा परब्रह्म पुरुषोत्तम दर्शन देते हैं—यह बात अब अगले मन्त्रमें कहते हैं—