सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें विशुद्ध अन्त:करणवाले साधककी सामर्थ्यका वर्णन करनेके लिये प्रसङ्गवश कामनाओंकी पूर्तिकी बात आ गयी थी; अत: निष्कामभावकी प्रशंसा और सकामभावकी निन्दा करते हुए पुन: प्रकरण आरम्भ करते हैं—
स वेदैतत् परमं ब्रह्म धाम
यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम्।
उपासते पुरुषं ये ह्यकामा-
स्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीरा:॥ १॥
स:=वह (निष्कामभाववाला पुरुष); एतत् =इस; परमम्=परम; शुभ्रम्=विशुद्ध (प्रकाशमान); ब्रह्म धाम=ब्रह्मधामको; वेद=जान लेता है; यत्र=जिसमें; विश्वम्=सम्पूर्ण जगत् ; निहितम्=स्थित हुआ; भाति=प्रतीत होता है; ये हि=जो भी कोई; अकामा:=निष्काम साधक; पुरुषम् उपासते=परमपुरुषकी उपासना करते हैं; ते=वे; धीरा:=बुद्धिमान्; शुक्रम्=रजोवीर्यमय; एतत् =इस शरीरको; अतिवर्तन्ति=अतिक्रमण कर जाते हैं॥ १॥
व्याख्या—थोड़ा-सा विचार करनेपर प्रत्येक बुद्धिमान् मनुष्यकी समझमें यह बात आ जाती है कि इस प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले जगत्के रचयिता और परमाधार कोई एक परमेश्वर अवश्य हैं। इस प्रकार जिनमें यह सम्पूर्ण जगत् स्थित हुआ प्रतीत होता है, उन परम विशुद्ध प्रकाशमय धामस्वरूप परब्रह्मपरमात्माको समस्त भोगोंकी कामनाका त्याग करके निरन्तर उनका ध्यान करनेवाला साधक जान लेता है। यह बात निश्चित है कि जो मनुष्य उन परम पुरुष परमात्माकी उपासना करते हैं और एकमात्र उन्हींको चाहते हैं, वे सर्वथा पूर्ण निष्काम होकर रहते हैं। किसी प्रकारके भोगोंमें उनका मन नहीं अटकता, अत: वे इस रजोवीर्यमय शरीरको लाँघ जाते हैं। उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इसीलिये उन्हें बुद्धिमान् कहा गया है; क्योंकि जो सार वस्तुके लिये असारको त्याग दे वही बुद्धिमान् है॥ १॥
सम्बन्ध—अब सकाम पुरुषकी निन्दा करते हुए ऊपर कही हुई बातको स्पष्ट करते हैं—