तदेतत् सत्यमृषिरङ्गिरा: पुरोवाच नैतदचीर्णव्रतोऽधीते। नम: परमऋषिभ्यो नम: परमऋषिभ्य:॥ ११॥
तत् =उसी; एतत् =इस; सत्यम्=सत्यको अर्थात् यथार्थ विद्याको; पुरा=पहले; अङ्गिरा: ऋषि:=अङ्गिरा ऋषिने; उवाच=कहा था; अचीर्णव्रत:=जिसने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन नहीं किया है; एतत् =(वह) इसे; न=नहीं; अधीते=पढ़ सकता; परमऋषिभ्य: नम:=परम ऋषियोंको नमस्कार है; परमऋषिभ्य: नम:=परम ऋषियोंको नमस्कार है॥ ११॥
व्याख्या—उस ब्रह्मविद्यारूप इस सत्यका पहले महर्षि अङ्गिराने उपर्युक्त प्रकारसे शौनक ऋषिको उपदेश दिया था। जिसने विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन नहीं किया हो, वह इसे नहीं पढ़ पाता अर्थात् इसका गूढ़ अभिप्राय नहीं समझ सकता। परम ऋषियोंको नमस्कार है, परम ऋषियोंको नमस्कार है, इस प्रकार दो बार ऋषियोंको नमस्कार करके ग्रन्थसमाप्तिकी सूचना दी गयी है॥ ११॥