एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो
यस्मिन् प्राण: पञ्चधा संविवेश।
प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां
यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येष आत्मा॥ ९॥
यस्मिन्=जिसमें; पञ्चधा=पाँच भेदोंवाला; प्राण:=प्राण; संविवेश=भलीभाँति प्रविष्ट है (उसी शरीरमें रहनेवाला); एष:=यह; अणु:=सूक्ष्म; आत्मा=आत्मा; चेतसा=मनसे; वेदितव्य:=जाननेमें आनेवाला है; प्रजानाम्=प्राणियोंका (वह); सर्वम्=सम्पूर्ण; चित्तम्=चित्त; प्राणै:=प्राणोंसे; ओतम्=व्याप्त है; यस्मिन् विशुद्धे=जिस अन्त:करणके विशुद्ध होनेपर; एष:=यह; आत्मा=आत्मा; विभवति=सब प्रकारसे समर्थ होता है॥ ९॥
व्याख्या—जिस शरीरमें प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान—इन पाँच भेदोंवाला प्राण प्रविष्ट होकर चेष्टायुक्त कर रहा है, उसी शरीरके भीतर हृदयके मध्यभागमें मनद्वारा ज्ञातारूपसे जाननेमें आनेवाला यह सूक्ष्म जीवात्मा भी रहता है। परंतु समस्त प्राणियोंके समस्त अन्त:करण प्राणोंसे ओत-प्रोत हो रहे हैं, अर्थात् इस प्राण और इन्द्रियोंके तृप्त करनेके लिये उत्पन्न हुई नाना प्रकारकी भोगवासनाओंसे मलिन और क्षुब्ध हो रहे हैं, इस कारण सब लोग परमात्माको नहीं जान पाते। अन्त:करणके विशुद्ध होनेपर ही यह जीवात्मा सब प्रकारसे समर्थ होता है। अत: यदि भोगोंसे विरक्त होकर यह परमात्माके चिन्तनमें लग जाता है, तब तो परमात्माको प्राप्त कर लेता है; और यदि भोगोंकी कामना करता है तो इच्छित भोगोंको प्राप्त कर लेता है॥ ९॥