न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा
नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्व-
स्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमान:॥ ८॥
न चक्षुषा=(वह परमात्मा) न तो नेत्रोंसे; न वाचा=न वाणीसे (और); न अन्यै:=न दूसरी; देवै:=इन्द्रियोंसे; अपि=ही; गृह्यते=ग्रहण करनेमें आता है (तथा); तपसा=तपसे; वा=अथवा; कर्मणा=कर्मोंसे भी (वह); [न गृह्यते]=ग्रहण नहीं किया जा सकता; तम्=उस; निष्कलम्=अवयवरहित (परमात्मा) को; तु=तो; विशुद्धसत्त्व:=विशुद्ध अन्त:करणवाला (साधक); तत:=उस विशुद्ध अन्त:करणसे; ध्यायमान:=(निरन्तर उसका) ध्यान करता हुआ ही; ज्ञानप्रसादेन=ज्ञानकी निर्मलतासे; पश्यते=देख पाता है॥ ८॥
व्याख्या—उन परब्रह्मको मनुष्य इन आँखोंसे नहीं देख सकता; इतना ही नहीं, वाणी आदि अन्य इन्द्रियोंद्वारा भी वे पकड़में नहीं आ सकते तथा नाना प्रकारकी तपश्चर्या और कर्मोंके द्वारा भी मनुष्य उन्हें नहीं पा सकता। उन अवयवरहित परम विशुद्ध परमात्माको तो मनुष्य सब भोगोंसे मुख मोड़कर, नि:स्पृह होकर विशुद्ध अन्त:करणके द्वारा निरन्तर एकमात्र उन्हींका ध्यान करते-करते ज्ञानकी निर्मलतासे ही देख सकता है। अत: जो उन परमात्माको पाना चाहे, उसे उचित है कि संसारके भोगोंसे सर्वथा विरक्त होकर उन सबकी कामनाका त्याग करके एकमात्र परब्रह्म परमात्माको ही पानेके लिये उन्हींके चिन्तनमें निमग्न हो जाय॥ ८॥
सम्बन्ध—जब वे परब्रह्म परमात्मा सबके हृदयमें रहते हैं, तब सभी जीव उन्हें क्यों नहीं जानते? शुद्ध अन्त:करणवाला पुरुष ही क्या जानता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं—