बृहच्च तद् दिव्यमचिन्त्यरूपं
सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति।
दूरात् सुदूरे तदिहान्तिके च
पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम्॥ ७॥
तत् =वह परब्रह्म; बृहत् =महान्; दिव्यम्=दिव्य; च=और; अचिन्त्यरूपम्=अचिन्त्यस्वरूप है; च=तथा; तत् =वह; सूक्ष्मात् =सूक्ष्मसे भी; सूक्ष्मतरम्=अत्यन्त सूक्ष्मरूपमें; विभाति=प्रकाशित होता है; तत् =(तथा) वह; दूरात् =दूरसे भी; सुदूरे=अत्यन्त दूर है; [च]=और; इह=इस (शरीर) में रहकर; अन्तिके च=अति समीप भी है; इह=यहाँ; पश्यत्सु=देखनेवालोंके भीतर; एव=ही; गुहायाम्=उनके हृदयरूपी गुफामें; निहितम्=स्थित है॥ ७॥
व्याख्या—वे परब्रह्म परमात्मा सबसे महान्, दिव्य—अलौकिक और अचिन्त्यस्वरूप हैं अर्थात् उनका स्वरूप मनके द्वारा चिन्तनमें आनेवाला नहीं है। अत: मनुष्यको श्रद्धापूर्वक परमात्माकी प्राप्तिके पूर्वकथित साधनोंमें लगे रहना चाहिये। वे परमात्मा अचिन्त्य एवं सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म होनेपर भी साधन करते-करते स्वयं अपने स्वरूपको साधकके हृदयमें प्रकाशित कर देते हैं। परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण हैं; ऐसा कोई भी स्थान नहीं, जहाँ वे न हों। अत: वे दूरसे भी दूर हैं, अर्थात् जहाँतक हमलोग दूरका अनुभव करते हैं, वहाँ भी वे हैं और निकटसे भी निकट यहीं अपने भीतर ही हैं। अधिक क्या, देखनेवालोंमें ही उनके हृदयरूप गुफामें छिपे हुए हैं। अत: उन्हें खोजनेके लिये कहीं दूसरी जगह जानेकी आवश्यकता नहीं है॥ ७॥