सत्यमेव जयति नानृतं
सत्येन पन्था विततो देवयान:।
येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा
यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्॥ ६॥
सत्यम्=सत्य; एव=ही; जयति=विजयी होता है; अनृतम्=झूठ; न=नहीं; हि=क्योंकि; देवयान:=वह देवयान नामक; पन्था:=मार्ग; सत्येन=सत्यसे; वितत:=परिपूर्ण है; येन=जिससे; आप्तकामा:=पूर्णकाम; ऋषय:= ऋषिलोग (वहाँ); आक्रमन्ति=गमन करते हैं; यत्र=जहाँ; तत् =वह; सत्यस्य=सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माका; परमम्=उत्कृष्ट; निधानम्=धाम है॥ ६॥
व्याख्या—सत्यकी ही विजय होती है, झूठकी नहीं। अभिप्राय यह है कि परमात्मा सत्यस्वरूप हैं; अत: उनकी प्राप्तिके लिये मनुष्यमें सत्यकी प्रतिष्ठा होनी चाहिये। परमात्मप्राप्तिके लिये तो सत्य अनिवार्य साधन है ही; जगत्में दूसरे सब कार्योंमें भी अन्तत: सत्यकी ही विजय होती है, झूठकी नहीं। जो लोग मिथ्या-भाषण, दम्भ और कपटसे उन्नतिकी आशा रखते हैं, वे अन्तमें बुरी तरहसे निराश होते हैं। मिथ्या-भाषण और मिथ्या-आचरणोंमें भी जो सत्यका आभास है, जिसके कारण दूसरे लोग उसे किसी अंशमें सत्य मान लेते हैं, उसीसे कुछ क्षणिक लाभ-सा हो जाता है। परंतु उसका परिणाम अच्छा नहीं होता। अन्तमें सत्य सत्य ही रहता है और झूठ झूठ ही। इसीसे बुद्धिमान् मनुष्य सत्यभाषण और सदाचारको ही अपनाते हैं, झूठको नहीं; क्योंकि जिनकी भोग-वासना नष्ट हो गयी है, ऐसे पूर्णकाम ऋषिलोग जिस मार्गसे वहाँ पहुँचते हैं, जहाँ इस सत्यके परमाधार परब्रह्म परमात्मा स्थित हैं, वह देवयान-मार्ग अर्थात् उन परमदेव परमात्माको प्राप्त करनेका साधनरूप मार्ग सत्यसे ही परिपूर्ण है, उसमें असत्य-भाषण और दम्भ, कपट आदि असत् आचरणोंके लिये स्थान नहीं है॥ ६॥
सम्बन्ध—उपर्युक्त साधनोंसे प्राप्त होनेवाले परमात्माके स्वरूपका पुन: वर्णन करते हैं—