सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा
सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्।
अन्त:शरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो
यं पश्यन्ति यतय: क्षीणदोषा:॥ ५॥
एष:=यह; अन्त:शरीरे हि=शरीरके भीतर ही (हृदयमें विराजमान); ज्योतिर्मय:=प्रकाशस्वरूप (और); शुभ्र:=परम विशुद्ध; आत्मा=परमात्मा; हि=निस्संदेह; सत्येन=सत्य-भाषणसे; तपसा=तपसे (और); ब्रह्मचर्येण=ब्रह्मचर्यपूर्वक; सम्यग्ज्ञानेन=यथार्थ ज्ञानसे ही; नित्यम्=सदा; लभ्य:=प्राप्त होनेवाला है; यम्=जिसे; क्षीणदोषा:=सब प्रकारके दोषोंसे रहित हुए; यतय:=यत्नशील साधक ही; पश्यन्ति=देख पाते हैं॥ ५॥
व्याख्या—सबके शरीरके भीतर हृदयमें विराजमान परम विशुद्ध प्रकाशमय ज्ञानस्वरूप परब्रह्म परमात्मा, जिनको सब प्रकारके दोषोंसे रहित हुए प्रयत्नशील साधक ही जान सकते हैं, वे परमात्मा सदैव सत्य-भाषण, तपश्चर्या, संयम और स्वार्थत्याग तथा ब्रह्मचर्यके पालनसे उत्पन्न यथार्थ ज्ञानद्वारा ही प्राप्त हो सकते हैं। इनसे रहित होकर जो भोगोंमें आसक्त हैं; भोगोंकी प्राप्तिके लिये नाना प्रकारके मिथ्याभाषण करते हैं और आसक्तिवश नियमपूर्वक अपने वीर्यकी रक्षा नहीं कर सकते, वे स्वार्थपरायण अविवेकी मनुष्य उन परमात्माका अनुभव नहीं कर सकते; क्योंकि वे उनको चाहते ही नहीं॥ ५॥
सम्बन्ध—पूर्वोक्त साधनोंमेंसे सत्यकी महिमा बताते हैं—