प्राणो ह्येष य: सर्वभूतैर्विभाति
विजानन् विद्वान् भवते नातिवादी।
आत्मक्रीड आत्मरति: क्रियावा-
नेष ब्रह्मविदां वरिष्ठ:॥ ४॥
एष:=यह (परमेश्वर); हि=ही; प्राण:=प्राण है; य:=जो; सर्वभूतै:=सब प्राणियोंके द्वारा; विभाति=प्रकाशित हो रहा है; विजानन्=(इसको) जाननेवाला; विद्वान्=ज्ञानी; अतिवादी=अभिमानपूर्वक बढ़-बढ़कर बातें करनेवाला; न भवते=नहीं होता (किंतु वह); क्रियावान्=यथायोग्य भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म करता हुआ; आत्मक्रीड:=सबके आत्मरूप अन्तर्यामी परमेश्वरमें क्रीडा करता रहता है (और); आत्मरति:=सबके आत्मा अन्तर्यामी परमेश्वरमें ही रमण करता रहता है; एष:=यह (ज्ञानी भक्त); ब्रह्मविदाम्=ब्रह्मवेत्ताओंमें भी; वरिष्ठ:=श्रेष्ठ है॥ ४॥
व्याख्या—ये सर्वव्यापी परमेश्वर ही सबके प्राण हैं; जिस प्रकार शरीरकी सारी चेष्टाएँ प्राणके द्वारा होती हैं, उसी प्रकार इस विश्वमें भी जो कुछ हो रहा है, परमात्माकी शक्तिसे ही हो रहा है। समस्त प्राणियोंमें भी उन्हींका प्रकाश है, वे ही उन प्राणियोंके द्वारा प्रकाशित हो रहे हैं। इस बातको समझनेवाला ज्ञानी भक्त कभी बढ़-बढ़कर बातें नहीं करता; क्योंकि वह जानता है कि उसके अंदर भी उन सर्वव्यापक परमात्माकी ही शक्ति अभिव्यक्त है; फिर वह किस बातपर अभिमान करे। वह तो लोकसंग्रहके लिये भगवदाज्ञानुसार अपने वर्ण, आश्रमके अनुकूल कर्म करता हुआ सबके आत्मा अन्तर्यामी भगवान्में ही क्रीडा करता है। (गीता ६। ३१) वह सदा भगवान्में ही रमण करता है। ऐसा यह भगवान्का ज्ञानी भक्त ब्रह्मवेत्ताओंमें भी अति श्रेष्ठ है। गीतामें भी सबको वासुदेवरूप देखनेवाले ज्ञानी भक्तको महात्मा और सुदुर्लभ बताया गया है (७। १९)॥ ४॥
सम्बन्ध—उन परमात्माकी प्राप्तिके साधन बताते हैं—