समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो-
ऽनीशया शोचति मुह्यमान:।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीश-
मस्य महिमानमिति वीतशोक:॥ २॥ *
* ये दोनों मन्त्र श्वेता० उ० ४। ६,७ में भी इसी रूपमें आये हैं।
समाने वृक्षे=पूर्वोक्त शरीररूपी समान वृक्षपर (रहनेवाला); पुरुष:= जीवात्मा; निमग्न:=(शरीरकी गहरी आसक्तिमें) डूबा हुआ है; अनीशया= असमर्थतारूप दीनताका अनुभव करता हुआ; मुह्यमान:=मोहित होकर; शोचति=शोक करता रहता है; यदा=जब कभी (भगवान्की अहैतुकी दयासे); जुष्टम्=(भक्तोंद्वारा नित्य) सेवित; अन्यम्=अपनेसे भिन्न; ईशम्=परमेश्वरको (और); अस्य महिमानम्=उनकी महिमाको; पश्यति=यह प्रत्यक्ष कर लेता है; इति=तब; वीतशोक:=सर्वथा शोकरहित हो जाता है॥ २॥
व्याख्या—पहले वर्णन किये हुए शरीररूप एक ही वृक्षपर हृदयरूप घोंसलेमें रहनेवाला यह जीवात्मा जबतक अपने साथ रहनेवाले उन परम सुहृद् परमेश्वरकी ओर नहीं देखता, शरीरमें ही आसक्त होकर इसीमें निमग्न हुआ रहता है अर्थात् शरीरमें अतिशय ममता करके उसके द्वारा भोगोंके भोगनेमें ही रचा-पचा रहता है तबतक असमर्थतारूप दीनतासे मोहित होकर वह नाना प्रकारके दु:ख भोगता रहता है। जब कभी भगवान्की निर्हैतुकी दयासे अपनेसे भिन्न, नित्य अपने ही समीप रहनेवाले, परम सुहृद्, परमप्रिय और भक्तोंद्वारा सेवित ईश्वरको और उनकी आश्चर्यमयी महिमाको, जो जगत्में सर्वत्र भिन्न-भिन्न प्रकारसे प्रकट हो रही है, प्रत्यक्ष कर लेता है, तब वह तत्काल ही सर्वथा शोकरहित हो जाता है॥ २॥
सम्बन्ध—ईश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए उन्हें जान लेनेका फल बताते हैं—