यं यं लोकं मनसा संविभाति
विशुद्धसत्त्व: कामयते यांश्च कामान्।
तं तं लोकं जयते तांश्च कामां-
स्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद् भूतिकाम:॥ १०॥
विशुद्धसत्त्व:=विशुद्ध अन्त:करणवाला (मनुष्य); यम् यम्=जिस-जिस; लोकम्=लोकको; मनसा=मनसे; संविभाति=चिन्तन करता है; च=तथा; यान् कामान् कामयते=जिन भोगोंकी कामना करता है; तम् तम्=उन-उन; लोकम्=लोकोंको; जयते=जीत लेता है; च=और; तान् कामान्=उन (इच्छित) भोगोंको भी प्राप्त कर लेता है; तस्मात् हि=इसीलिये; भूतिकाम:=ऐश्वर्यकी कामनावाला मनुष्य; आत्मज्ञम्=शरीरसे भिन्न आत्माको जाननेवाले महात्माकी; अर्चयेत् =सेवा-पूजा करे॥ १०॥
व्याख्या—विशुद्ध अन्त:करणवाला मनुष्य यदि भोगोंसे सर्वथा विरक्त होकर उस निर्मल अन्त:करणद्वारा निरन्तर परब्रह्म परमेश्वरका ध्यान करता है—तब तो उन्हें प्राप्त कर लेता है यह बात आठवें मन्त्रमें कही जा चुकी है; परंतु यदि वह सर्वथा निष्काम नहीं होता तो जिस-जिस लोकका मनसे चिन्तन करता है तथा जिन-जिन भोगोंको चाहता है, उन-उन लोकोंको ही जीतता है—उन्हीं लोकोंमें जाता है तथा उन-उन भोगोंको ही प्राप्त करता है। इसलिये ऐश्वर्यकी कामनावाले मनुष्यको चाहिये कि शरीरसे भिन्न आत्माको जाननेवाले विशुद्ध अन्त:करणयुक्त विवेकी पुरुषकी सेवा-पूजा (आदर-सत्कार) करे; क्योंकि वह अपने लिये और दूसरोंके लिये भी जो-जो कामना करता है, वह पूर्ण हो जाती है॥ १०॥