हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम्।
तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदु:॥ ९॥
तत् =वह; विरजम्=निर्मल; निष्कलम्=अवयवरहित; ब्रह्म=परब्रह्म; हिरण्मये परे कोशे=प्रकाशमय परम कोशमें—परमधाममें (विराजमान है); तत् =वह; शुभ्रम्=सर्वथा विशुद्ध; ज्योतिषाम्=समस्त ज्योतियोंकी भी; ज्योति:=ज्योति है; यत् =जिसको; आत्मविद:=आत्मज्ञानी; विदु:=जानते हैं॥ ९॥
व्याख्या—वे निर्मल—निर्विकार और अवयवरहित—अखण्ड परमात्मा प्रकाशमय परमधाममें विराजमान हैं; वे सर्वथा विशुद्ध और समस्त प्रकाशयुक्त पदार्थोंके भी प्रकाशक हैं तथा उन्हें आत्मज्ञानी महात्माजन ही जानते हैं॥ ९॥