भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया:।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे॥ ८॥
तस्मिन् परावरे दृष्टे=कार्य-कारणस्वरूप उस परात्पर पुरुषोत्तमको तत्त्वसे जान लेनेपर; अस्य हृदयग्रन्थि:=इस (जीवात्मा) के हृदयकी गाँठ; भिद्यते=खुल जाती है; सर्वसंशया:=सम्पूर्ण संशय; छिद्यन्ते=कट जाते हैं; च=और; कर्माणि=समस्त शुभाशुभ कर्म; क्षीयन्ते=नष्ट हो जाते हैं॥ ८॥
व्याख्या—कार्य और कारणस्वरूप उन परात्पर परब्रह्म पुरुषोत्तमको तत्त्वसे जान लेनेपर इस जीवके हृदयकी अविद्यारूप वह गाँठ खुल जाती है, जिसके कारण इसने इस जड शरीरको ही अपना स्वरूप मान रखा है; इतना ही नहीं; इसके समस्त संशय सर्वथा कट जाते हैं और समस्त शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं। अर्थात् यह जीव सब बन्धनोंसे सर्वथा मुक्त होकर परमानन्दस्वरूप परमेश्वरको प्राप्त हो जाता है॥ ८॥
सम्बन्ध—उन परब्रह्मके स्थान, स्वरूप और उनकी महिमाका वर्णन करते हैं—