अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाडॺ:
स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमान:।
ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं
स्वस्ति व: पाराय तमस: परस्तात्॥ ६॥
रथनाभौ=रथकी नाभिमें (जुड़े हुए); अरा: इव=अरोंकी भाँति; यत्र= जिसमें; नाडॺ:=समस्त देहव्यापिनी नाड़ियाँ; संहता:=एकत्र स्थित हैं; (उसी हृदयमें) स:=वह; बहुधा=बहुत प्रकारसे; जायमान:=उत्पन्न होनेवाला; एष:=यह (अन्तर्यामी परमेश्वर); अन्त:=मध्यभागमें; चरते=रहता है; [एनम्]=इस; आत्मानम्=सर्वात्मा परमात्माका; ओम्=ओम्; इति एवम्=इस नामके द्वारा ही; ध्यायथ=ध्यान करो; तमस: परस्तात् =अज्ञानमय अन्धकारसे अतीत; पाराय=(तथा) भवसागरसे अन्तिम तटरूप पुरुषोत्तमकी प्राप्तिके लिये (साधन करनेमें); व:=तुमलोगोंका; स्वस्ति=कल्याण हो॥ ६॥
व्याख्या—‘जिस प्रकार रथके पहियेके केन्द्रमें अरे लगे रहते हैं, उसी प्रकार शरीरकी समस्त नाड़ियाँ जिस हृदयदेशमें एकत्र स्थित हैं, उसी हृदयमें नाना रूपसे प्रकट होनेवाले परब्रह्म परमात्मा अन्तर्यामीरूपसे रहते हैं। इन सबके आत्मा पुरुषोत्तमका ‘ओम्’ इस नामके उच्चारणके साथ-साथ निरन्तर ध्यान करते रहो। इस प्रकार परमात्माके ‘ओम्’ इस नामका जप और उसके अर्थभूत परमात्माका ध्यान करते रहनेसे तुम उन परमात्माको प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाओगे, जो अज्ञानरूप अन्धकारसे सर्वथा अतीत और संसार-समुद्रके दूसरे पार हैं। तुम्हारा कल्याण हो।’ इस प्रकार आचार्य उपर्युक्त विधिसे साधन करनेवाले शिष्योंको आशीर्वाद देते हैं॥ ६॥
सम्बन्ध—पुन: परमेश्वरके स्वरूपका ही वर्णन करते हैं—