यस्मिन् द्यौ: पृथिवी चान्तरिक्ष-
मोतं मन: सह प्राणैश्च सर्वै:।
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या
वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतु:॥ ५॥
यस्मिन्=जिसमें; द्यौ:=स्वर्ग; पृथिवी=पृथिवी; च=और; अन्तरिक्षम्=और उनके बीचका आकाश; च=तथा; सर्वै: प्राणै: सह=समस्त प्राणोंके सहित; मन:=मन; ओतम्=गुँथा हुआ है; तम् एव=उसी; एकम्=एक; आत्मानम्=सबके आत्मरूप परमेश्वरको; जानथ=जानो; अन्या:=दूसरी; वाच:=सब बातोंको; विमुञ्चथ=सर्वथा छोड़ दो; एष:=यही; अमृतस्य=अमृतका; सेतु:=सेतु है॥ ५॥
व्याख्या—जिन परब्रह्म परमात्मामें स्वर्ग, पृथ्वी तथा उनके बीचका सम्पूर्ण आकाश एवं समस्त प्राण और इन्द्रियोंके सहित मन-बुद्धिरूप अन्त:करण सब-के-सब ओत-प्रोत हैं; उन्हीं एक सर्वात्मा परमेश्वरको तुम पूर्वोक्त उपायके द्वारा जानो; दूसरी सब बातोंको—ग्राम्यचर्चाको सर्वथा छोड़ दो। वे सब तुम्हारे साधनमें विघ्न हैं; अत: उनसे सर्वथा विरक्त होकर साधनमें तत्पर हो जाओ। यही अमृतका सेतु है, अर्थात् संसार-समुद्रसे पार होकर अमृतस्वरूप परमात्माको प्राप्त करनेके लिये पुलके सदृश है॥ ५॥
सम्बन्ध—पुन: परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए उनकी प्राप्तिका साधन बताते हैं—
श्री रामकृष्ण वाणी —
श्री श्रीरामकृष्ण: “इस कामिनी-काञ्चन को लेकर सब ही डूबे हुए हैं। मुझे किन्तु यह सब अच्छा नहीं लगता। कसम खाकर कहता हूँ, ईश्वर के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानता।” (स्रोत : श्री श्रीरामकृष्ण कथामृत-3)