प्रणवो धनु: शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्॥ ४॥
प्रणव:=(यहाँ) ओंकार ही; धनु:=धनुष है; आत्मा=आत्मा; हि=ही; शर:=बाण है (और); ब्रह्म=परब्रह्म परमेश्वर ही; तल्लक्ष्यम्=उसका लक्ष्य; उच्यते=कहा जाता है; अप्रमत्तेन=(वह) प्रमादरहित मनुष्यद्वारा ही; वेद्धव्यम्=बींधा जानेयोग्य है (अत:); शरवत्=(उसे बेधकर) बाणकी तरह; तन्मय:=(उस लक्ष्यमें) तन्मय; भवेत्=हो जाना चाहिये॥ ४॥
व्याख्या—ऊपर बतलाये हुए रूपकमें परमेश्वरका वाचक प्रणव (ओंकार) ही मानो धनुष है, यह जीवात्मा ही बाण है और परब्रह्म परमेश्वर ही उसके लक्ष्य हैं। तत्परतासे उनकी उपासना करनेवाले प्रमादरहित साधकद्वारा ही वह लक्ष्य बेधा जा सकता है; इसलिये हे सोम्य! तुझे पूर्वोक्तरूपसे उस लक्ष्यको बेधकर बाणकी ही भाँति उसमें तन्मय हो जाना चाहिये॥ ४॥
सम्बन्ध—पुन: परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए प्रमादरहित और विरक्त होकर उसे जाननेके लिये श्रुति कहती है—